मङ्गलम् — प्रथमः पाठः
पुस्तक: पीयूषम् (भाग-2) | कक्षा: 10 | बोर्ड: BSEB Bihar
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Table of Contents (विषय-सूची)
1. पाठ-परिचय (Sanskrit)
2. श्लोक 1: सत्य का आवरण (हिरण्मयेन पात्रेण)
3. श्लोक 2: अणु से सूक्ष्म, महान से महान (अणोरणीयान्)
4. श्लोक 3: सत्य की विजय (सत्यमेव जयते)
5. श्लोक 4: नदियों की समुद्र यात्रा (यथा नद्यः)
6. श्लोक 5: एकमात्र मोक्ष मार्ग (वेदाहमेतम्)
7. व्याकरण खण्ड – 5 संधि, 5 समास, 5 धातु-प्रत्यय
8. शब्दार्थ – 20 अर्थ (संस्कृत से हिन्दी)
9. MCQ – 10 बहुविकल्पीय प्रश्न (उत्तर सहित)
10. Subjective Questions – 5 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. पाठ-परिचय (Sanskrit)
उपनिषदः वैदिकवाङ्मयस्य अन्तिमे भागे दर्शनशास्त्रस्य सिद्धान्तान् प्रकटयन्ति।
सर्वत्र परमपुरुषस्य परमात्मनः महिमा प्रधानतया गीयते।
तेन परमात्मना जगत् व्याप्तमनुशासितं चास्ति।
स एव सर्वेषां तपसां परमं लक्ष्यम्।
अस्मिन् पाठे परमात्मपरा उपनिषदां पद्यात्मकाः पञ्च मन्त्राः संकलिताः सन्ति।
📖 पाठ-परिचय (Hindi)
उपनिषदें वैदिक वाङ्मय के अंतिम भाग में दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों को प्रकट करती हैं।
सर्वत्र परमपुरुष परमात्मा की महिमा प्रधान रूप से गाई गई है।
उस परमात्मा द्वारा जगत् व्याप्त और शासित है।
वही सभी तपस्याओं का परम लक्ष्य है।
इस पाठ में परमात्मा विषयक उपनिषदों के पद्यात्मक पाँच मंत्र संकलित हैं।
📿 पञ्च मन्त्राः (पाँच मंत्र)
2. श्लोक 1: सत्य का आवरण (हिरण्मयेन पात्रेण)
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्पावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
ईशावास्योपनिषद् — 15तत्त्वं पूषन्पावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
हिन्दी अनुवाद
सत्य का मुख सुनहरे पात्र से ढका हुआ है।हे पूषन् (सूर्य)! सत्यधर्म के दर्शन के लिए उस आवरण को हटा दो॥
3. श्लोक 2: अणु से सूक्ष्म, महान से महान (अणोरणीयान्)
अणोरणीयान् महतो महीयान्,
आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको,
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥
कठोपनिषद् — 1.2.20आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको,
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥
हिन्दी अनुवाद
परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है,वह प्राणी के हृदय की गुफा में छिपा हुआ है।
जो व्यक्ति शोकरहित होकर इंद्रियों की शांति से
उसे देखता है, वह उस आत्मा की महिमा को पा लेता है॥
4. श्लोक 3: सत्य की विजय (सत्यमेव जयते)
सत्यमेव जयते नानृतं
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्त् ऋषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परं निधानम्॥
मुण्डकोपनिषद् — 3.1.5सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्त् ऋषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परं निधानम्॥
हिन्दी अनुवाद
सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं।सत्य से ही देवयान मार्ग विस्तृत होता है।
जिस मार्ग से इच्छापूर्ण ऋषिजन आगे बढ़े,
वहीं सत्य का परम भंडार है॥
5. श्लोक 4: नदियों की समुद्र यात्रा (यथा नद्यः)
यथा नः स्यन्दमानाः समुद्रे–
ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय।
तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः
परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
मुण्डकोपनिषद् — 3.2.8ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय।
तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः
परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
हिन्दी अनुवाद
जैसे नदियाँ बहते-बहते समुद्र मेंअपना नाम और रूप छोड़कर विलीन हो जाती हैं।
वैसे ही विद्वान् नाम और रूप से मुक्त होकर
उस परमपुरुष परमात्मा को दिव्य रूप में प्राप्त कर लेता है॥
6. श्लोक 5: एकमात्र मोक्ष मार्ग (वेदाहमेतम्)
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
श्वेताश्वरोपनिषद् — 3.8आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
हिन्दी अनुवाद
मैं उस महान पुरुष को जानता हूँजो सूर्य के समान तेजस्वी और अंधकार से परे है।
उसे जानकर ही मृत्यु को पार किया जा सकता है,
मोक्ष प्राप्ति का इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है॥
📋 श्लोक-सारांश तालिका
| श्लोक | स्रोत (Source) | मुख्य भाव |
|---|---|---|
| 1 | ईशावास्योपनिषद् 15 - | सत्य सुनहरे आवरण से ढका है — हे सूर्य! उसे प्रकट करो |
| 2 | कठोपनिषद् 1.2.20 - | परमात्मा सूक्ष्म से सूक्ष्म, महान से महान — हृदय में निवास |
| 3 | मुण्डकोपनिषद् 3.1.5 - | सत्यमेव जयते — सत्य से ही मोक्ष का मार्ग |
| 4 | मुण्डकोपनिषद् 3.2.8 - | नदी की तरह नाम-रूप छोड़कर परमात्मा में विलीन होना |
| 5 | श्वेताश्वरोपनिषद् 3.8 - | उस तेजस्वी परमपुरुष को जानकर ही मृत्यु पार होती है |
7. व्याकरण खण्ड – 5 संधि, 5 समास, 5 धातु-प्रत्यय
5 संधि (स्वर/व्यंजन/विसर्ग)
1. सत्यस्यापिहितम् = सत्यस्य + अपिहितम् (स्वर संधि – अ + अ = आ)
2. नानृतम् = न + अनृतम् (स्वर संधि – अ + अ = आ)
3. विद्यतेऽयनाय = विद्यते + अयनाय (स्वर संधि – अ + अ = आ → विद्यतेऽयनाय)
4. तमक्रतुः = तम् + अक्रतुः (स्वर संधि – अ + अ = आ → तमक्रतुः)
5. नामरूपाद्विमुक्तः = नामरूपात् + विमुक्तः (व्यंजन संधि – त् + व = द्व)
5 समास
1. हिरण्मयेन = हिरण्मय + टाप् (कर्मधारय – सुनहरे से युक्त)
2. सत्यधर्माय = सत्यस्य धर्मः (षष्ठी तत्पुरुष)
3. अणोरणीयान् = अणोः अणीयान् (अपादान तत्पुरुष)
4. देवयानः = देवानां यानः (षष्ठी तत्पुरुष)
5. आप्तकामाः = आप्तः कामः यैः (बहुव्रीहि समास)
5 धातु + प्रत्यय (प्रकृति-प्रत्यय)
1. √जि (जीतना) | विजय | लट् (प्रथमपुरुष) | जयते |
2. √गम् (जाना) | गति | क्त | गच्छन्ति |
3. √विद् (जानना) | ज्ञान | शतृ | विद्वान् |
4. √पश् (देखना) | दर्शन | लट् | पश्यति |
5. √नश् (नष्ट होना) | लय | लट् | गच्छन्ति (प्रयोग) |
शब्दार्थ – 20 अर्थ (संस्कृत → हिन्दी)
1. हिरण्मय – सुनहरा
2. पात्र – पात्र/मण्डल
3. सत्य – सत्य/परम सत्ता
4. अपिहित – ढका हुआ
5. मुख – मुँह/मुख
6. पूषन् – पोषक सूर्यदेव
7. अपावृणु – हटा/खोल
8. धर्म – धर्म/स्वभाव
9. अणु – सूक्ष्म
10. महत् – महान
11. आत्मन् – आत्मा/परमात्मा
12. गुहा – गुफा (हृदय)
13. अक्रतुः – बिना संकल्प के/इन्द्रिय संयमी
14. वीतशोक – शोकरहित
15. प्रसाद – कृपा
16. अनृत – असत्य
17. देवयान – देवताओं का मार्ग
18. निधान – खजाना/भण्डार
19. विदित्वा – जानकर
20. अयन – मार्ग/साधन
MCQ (10 बहुविकल्पीय प्रश्न) – उत्तर सहित
1. 'हिरण्मयेन पात्रेण' में किसका मुख ढका हुआ है?
a) अज्ञान का
b) सत्य का
c) असत्य का
d) मृत्यु का
उत्तर: b) सत्य का
2. 'तत् त्वं पूषन्नपावृणु' में 'पूषन्' कौन हैं?
a) चन्द्रदेव
b) अग्निदेव
c) सूर्यदेव
d) वायुदेव
उत्तर: c) सूर्यदेव
3. आत्मा कहाँ निहित है (कठोपनिषद् के अनुसार)?
a) आकाश में
b) हृदय गुफा में
c) मस्तिष्क में
d) सूर्य में
उत्तर: b) हृदय गुफा में
4. 'सत्यमेव जयते' किस उपनिषद् से लिया गया है?
a) ईशावास्य
b) कठ
c) मुण्डक
d) श्वेताश्वतर
उत्तर: c) मुण्डक
5. असत्य की क्या होती है?
a) विजय
b) पराजय
c) पूजा
d) अमरता
उत्तर: b) पराजय
6. नदियाँ समुद्र में क्या छोड़ती हैं?
a) पानी
b) नाम और रूप
c) गति
d) ताप
उत्तर: b) नाम और रूप
7. परात्पर पुरुष कैसा है (श्वेताश्वतर)?
a) अंधकारमय
b) आदित्यवर्ण (सूर्य के समान)
c) चन्द्रवर्ण
d) जलवर्ण
उत्तर: b) आदित्यवर्ण
8. मोक्ष का एकमात्र मार्ग क्या है?
a) यज्ञ
b) दान
c) उस परम पुरुष को जानना
d) तपस्या
उत्तर: c) उस परम पुरुष को जानना
9. 'वीतशोकः' का अर्थ क्या है?
a) शोक सहित
b) शोकरहित
c) शोक देने वाला
d) शोक से भरा
उत्तर: b) शोकरहित
10. 'अणोरणीयान्' का क्या तात्पर्य है?
a) परमात्मा सबसे बड़ा है
b) परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है
c) परमात्मा दूर है
d) परमात्मा अज्ञात है
उत्तर: b) परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है
Subjective Questions (5 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)
प्रश्न 1: 'सत्यमेव जयते' का उपनिषदों में क्या महत्त्व है? तीन वाक्यों में समझाइए।
उत्तर:
सत्य की विजय सार्वभौमिक सिद्धान्त है। यह असत्य के विनाश का सन्देश देता है। सत्य ही देवयान (मोक्ष मार्ग) का आधार है और परमात्मा की प्राप्ति का साधन है।
प्रश्न 2: नदी और समुद्र के उदाहरण से आत्म-साक्षात्कार कैसे समझाया गया है?
उत्तर:
नदियाँ अपना अलग नाम व रूप छोड़ समुद्र में लीन हो जाती हैं। इसी प्रकार विद्वान व्यक्ति अहंकार, नाम और रूप का त्याग कर परमात्मा में लीन हो जाता है। यह अद्वैत भावना का सुन्दर चित्रण है।
प्रश्न 3: 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति' का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इस मन्त्र का अर्थ है कि केवल परमात्मा को यथार्थ रूप से जानने से ही मृत्यु (जन्म-मरण का बन्धन) समाप्त होता है। यह ज्ञान कर्मकाण्ड या यज्ञों से नहीं, बल्कि ब्रह्म-साक्षात्कार से मिलता है। मोक्ष का यही एकमात्र मार्ग है।
प्रश्न 4: अणोरणीयान् महतो महीयान् से परमात्मा के किन गुणों का बोध होता है?
उत्तर:
परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होने पर भी सर्वव्यापी है। वह सबसे बड़े से भी बड़ा अर्थात् सृष्टि के सभी विराट रूपों से परे है। यह कथन उसकी अचिन्त्य शक्ति और सर्वव्यापकता को दर्शाता है।
प्रश्न 5: उपनिषदों के अनुसार 'सत्य' और 'धर्म' में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
सत्य ही धर्म की नींव है। सत्य के आवरण को हटाने पर ही धर्म (सत्यधर्म) का दर्शन होता है। बिना सत्य के कोई भी धर्म अधूरा है और सत्य का पालन ही मोक्ष का सोपान है।
📚 पीयूषम् भाग-2 · Class 10 Sanskrit · BSEB Bihar
