तृतीयः पाठः - अलसकथा
Table of Content (विषय-सूची)
1. पाठ एवं लेखक का परिचय
2. कथा की पृष्ठभूमि – वीरेश्वर मंत्री का चरित्र
3. आलसियों का एकत्र होना एवं धूर्तों का कपट
4. अलसशाला में अग्नि-परीक्षा का आयोजन
5. चार अलसियों का संवाद
6. नियोगियों द्वारा उद्धार एवं श्लोक
7. अंतिम परिणाम – मंत्री की अधिक दया
8. 5 संस्कृत संधियाँ
9. 5 संस्कृत समास
10. 5 धातु + प्रत्यय (प्रकृति-प्रत्यय)
11. 20 शब्दार्थ – संस्कृत से हिंदी
12. 10 MCQ वस्तुनिष्ठ प्रश्न
13. 5 Subjective प्रश्न
1. पाठ एवं लेखक का परिचय
अयं पाठः विद्यापतिकृतस्य कथाग्रन्थस्य ‘पुरुषपरीक्षा’ इतिनामकस्य अंशविशेषो वर्तते। पुरुषपरीक्षा सरलसंस्कृतभाषायां कथारूपेण विभिन्नानां मानवगुणानां महत्त्वं वर्णयितुं दोषाणां च निराकरणाय शिक्षां ददाति। विद्यापतिः लोकप्रियः मैथिलकविः आसीत्। अपि च बहूनां संस्कृतग्रन्थानां निर्माता विद्यापतिः आसीत् इति तस्य विशिष्टता संस्कृतविषयेऽपि प्रभूता अस्ति। प्रस्तुते पाठे आलस्यनाम्नः दोषस्य निरूपणे व्यङ्ग्यात्मिका कथा प्रस्तुता विद्यते। नीतिकाराः आलस्यं रिपुरूपं मन्यन्ते।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
यह पाठ विद्यापति द्वारा रचित कथाग्रन्थ ‘पुरुषपरीक्षा’ नामक ग्रन्थ के एक अंशविशेष से लिया गया है। ‘पुरुषपरीक्षा’ सरल संस्कृत भाषा में कथा के रूप में विभिन्न मानवीय गुणों का महत्त्व बताने के लिए तथा दोषों को दूर करने की शिक्षा देती है। विद्यापति एक लोकप्रिय मैथिल कवि थे। साथ ही, अनेक संस्कृत ग्रन्थों के रचयिता भी विद्यापति ही थे – इस कारण संस्कृत के क्षेत्र में भी उनकी विशेषता अत्यधिक प्रसिद्ध है। प्रस्तुत पाठ में ‘आलस्य’ नामक दोष के वर्णन में व्यंग्यात्मक कथा प्रस्तुत की गई है। नीतिकार आलस्य को शत्रु के समान मानते हैं।
2. कथा की पृष्ठभूमि – वीरेश्वर मंत्री का चरित्र
आसीत् मिथिलायां वीरेश्वरो नाम मन्त्री। स च स्वभावाद् दानशीलः कारुणिकश्च। सर्वेभ्यो दुर्गतिभ्योऽनाथेभ्यश्च प्रत्यहमिच्छाभोजनं दापयति। तन्मध्येऽलसेभ्योऽप्यनवसरे दापयति।
हिंदी अनुवाद:
मिथिला नगरी में वीरेश्वर नामक एक मन्त्री रहता था। वह स्वभाव से दानशील और दयालु था। वह प्रतिदिन सभी दुर्गत तथा अनाथ लोगों को इच्छानुसार भोजन कराता था। उनमें आलसियों को भी बिना किसी काम के भोजन देता था।
3. आलसियों का एकत्र होना एवं धूर्तों का कपट
ततोऽलसपुरुषाणां तत्रेष्टलाभं श्रुत्वा बहवस्तुन्दपरिमार्जास्तत्र वर्तुलीबभूवुः। पश्चादलसानां सुखं दृष्ट्वा धूर्ता अपि कृत्रिममालस्यं दर्शयित्वा भोज्यं गृह्णन्ति।
हिंदी अनुवाद:
तब वहाँ आलसियों को सुख मिलने का समाचार सुनकर अनेक पेट सहलाने वाले (धूर्त) लोग वहाँ एकत्र हो गए। इसके बाद आलसियों का सुख देखकर धूर्त लोग भी कृत्रिम आलस्य दिखाकर भोजन लेने लगे।
4. अलसशाला में अग्नि-परीक्षा का आयोजन
तन्नियोगिपुरुषैः परामृष्टम् – “अक्षमबुद्ध्या करुणया केवलम् अलसेभ्यः स्वामी वस्तूनि दापयति, कपटेन अनलसा अपि गृह्णन्ति – इत्यस्माकं प्रमादः।” इति परामृश्य प्रसुप्तेषु अलसशालायां तन्नियोगिपुरुषाः वह्निं दापयित्वा निरूपणम् आरभन्त।
हिंदी अनुवाद:
मन्त्री के कर्मचारियों ने विचार किया – “स्वामी केवल असमर्थ बुद्धि और दया के कारण आलसियों को ही वस्तुएँ दिलवाते हैं; परन्तु कपट करके गैर-आलसी लोग भी (वे वस्तुएँ) ले जाते हैं – यह हमारी प्रमाद (गलती) है।” ऐसा विचार करके, जब सब आलसी शाला में सो रहे थे, तब कर्मचारियों ने वहाँ आग लगवा दी और (परीक्षा का) प्रारम्भ किया।
5. चार अलसियों का संवाद
एकेन वस्त्रावृतमुखेनोक्तम् – “अहो! कथमयं कोलाहलः?”
द्वितीयेनोक्तम् – “तर्क्यते यदस्मिन् गृहे अग्निर्लग्नोऽस्ति।”
तृतीयेनोक्तम् – “कोऽपि तथा धार्मिको नास्ति यः इदानीं जलार्द्रैः कटैः कम्बलैर्वा अस्मान् प्रावृणुयात्?”
चतुर्थेनोक्तम् – “अरे वाचालाः! किं केवलं वचनानि वक्तुं शक्नुथ? तूष्णीं कथं न तिष्ठथ?”
हिंदी अनुवाद:
एक ने मुँह पर कपड़ा डालकर कहा – “अरे! यह शोर कैसा है?”
दूसरे ने कहा – “लगता है कि इस घर में आग लग गई है।”
तीसरे ने कहा – “क्या कोई ऐसा धार्मिक पुरुष नहीं है, जो इस समय जल से भीगी हुई चटाइयों या कम्बलों से हमें ढाँक दे?”
चौथे ने कहा – “अरे बकवादियो! क्या केवल बातें ही कर सकते हो? चुप क्यों नहीं रहते?”
6. नियोगियों द्वारा उद्धार एवं श्लोक
नियोगिपुरुषैः दण्डभयेन चत्वारोऽप्यलसाः केशेष्वावाकृष्य गृहीत्वा गृहाद् विनिःसारिताः। पश्चात्तानालोक्य तैर्नियोगिभिः पठितम् – “पतिरेव गतिः स्त्रीणां बालानां जननी गतिः। आलसानां गतिः काचिल्लोके कारुणिकं विना॥”
हिंदी अनुवाद:
कर्मचारियों ने दण्ड के डर से चारों आलसियों को बालों से पकड़कर खींचा और घर से बाहर निकाल दिया। बाद में उनको देखकर कर्मचारियों ने यह श्लोक पढ़ा – “स्त्रियों की गति पति ही है, बच्चों की गति माता होती है। आलसियों की कोई गति नहीं होती – जब तक कोई दयालु व्यक्ति न हो (तब तक)।”
7. अंतिम परिणाम – मंत्री की अधिक दया
पश्चात् तेषु चतुर्ष्वलसेषु ततोऽप्यधिकतरं वस्तु मन्त्री दापयामास।
हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् उन चारों आलसियों पर उससे भी अधिक वस्तुएँ मन्त्री ने दिलवाईं।
8. इस पाठ से 5 संस्कृत संधियाँ
| 1 | सर्वेभ्यः + अनाथेभ्यः | सर्वेभ्योऽनाथेभ्यः | विसर्ग संधि (अ + अ = ओ) |
| 2 | अलसेभ्यः + अपि | अलसेभ्योऽपि | विसर्ग संधि |
| 3 | अनलसाः + अपि | अनलसा अपि
| 4 | केशेषु + आवाकृष्य | केशेष्वावाकृष्य | यण् संधि (इ + आ = या) |
| 5 | परामृश्य + प्रसुप्तेषु | परामृश्य प्रसुप्तेषु
9. इस पाठ से 5 संस्कृत समास
| 1 - दानशीलः = दाने शीलः यस्य | बहुव्रीहि समास |
| 2 - कारुणिकः = करुणा अस्ति यस्य | बहुव्रीहि |
| 3 - प्रत्यहम् = प्रति अहम् | अव्ययीभाव |
| 4 - कृत्रिममालस्यम् = कृत्रिमं च तत् आलस्यम् | कर्मधारय
| 5 - दुर्गतिभ्यः = दुर्गा गतिः येषाम् | बहुव्रीहि |
10. इस पाठ से 5 धातु + प्रत्यय (प्रकृति-प्रत्यय)|
| 1 | भू (सत्तायाम्) | भव् | शतृ (अत्) | भवतः
| 2 | दा (दाने) | दा | णिच् + णिचन्त से ल्यप् | दापयित्वा | कराकर |
| 3 | ग्रह (उपादाने) | ग्रह् | लकार (लट्) + तिप् | गृह्णन्ति | लेते हैं |
| 4 | वृत् (वर्तने) | वृत् | क्त | वृत्तम् (वर्तते = से) | हुआ |
| 5 | पठ् (पठने) | पठ् | क्तवतु | पठितम् | पढ़ा गया |
11. 20 शब्दार्थ – संस्कृत से हिंदी
| 1 - अलसकथा = आलसियों की कथा |
| 2 - मिथिला = एक प्राचीन नगरी (जनकपुर) |
| 3 - मन्त्री = मंत्री |
| 4 - दानशील = दान करने का स्वभाव वाला |
| 5 - दुर्गतिभ्यः = दुर्दशा को प्राप्त लोगों को |
| 6 - अनाथेभ्यः = अनाथों को |
| 7 - प्रत्यहम् = प्रतिदिन |
| 8 - इच्छाभोजनम् = इच्छानुसार भोजन |
| 9 - अलसः = आलसी |
| 10 - तुन्दपरिमार्जाः = पेट सहलाने वाले (धूर्त) |
| 11 - वर्तुलीबभूवुः = एकत्रित हो गए |
| 12 - धूर्ताः = धूर्त, चालाक लोग |
| 13 - कृत्रिमः = बनावटी |
| 14 - परामृष्टम् = विचार किया |
| 15 - अक्षमबुद्ध्या = असमर्थ बुद्धि के द्वारा |
| 16 - प्रमादः = असावधानी, गलती |
| 17 - वह्निः = आग |
| 18 - पलायिताः = भाग गए |
| 19 - कोलाहलः = शोरगुल |
| 20 - दण्डभयेन = दण्ड के डर से |
12. 10 MCQ वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1: मिथिला में मन्त्री किस नाम का था?
A) वीरसेन
B) वीरेश्वर
C) विद्यापति
D) वीरभद्र
उत्तर: B) वीरेश्वर
प्रश्न 2: मन्त्री किस स्वभाव का था?
A) क्रोधी
B) लोभी
C) दानशील एवं कारुणिक
D) ईर्ष्यालु
उत्तर: C) दानशील एवं कारुणिक
प्रश्न 3: आलसियों का सुख सुनकर कौन लोग वहाँ एकत्र हुए?
A) विद्वान
B) तुन्दपरिमार्जा (पेटू धूर्त)
C) राजा
D) सैनिक
उत्तर: B) तुन्दपरिमार्जा
प्रश्न 4: कर्मचारियों ने अलसशाला में क्या लगवाया?
A) पानी
B) वह्नि (आग)
C) बिजली
D) जाल
उत्तर: B) वह्नि (आग)
प्रश्न 5: धूर्त और ईषदलस (थोड़े आलसी) लोगों ने आग देखकर क्या किया?
A) सोते रहे
B) गाने लगे
C) पलायित (भाग) गए
D) मंत्री से शिकायत की
उत्तर: C) पलायित गए
प्रश्न 6: चार अलसियों ने आपस में क्या किया?
A) विवाद
B) आलपन (बातचीत)
C) भोजन
D) नृत्य
उत्तर: B) आलपन
प्रश्न 7: चौथे अलसी ने दूसरों को क्या कहा?
A) भागो
B) चुप रहो
C) आग बुझाओ
D) मदद करो
उत्तर: B) चुप रहो
प्रश्न 8: नियोगिपुरुषों ने अलसियों को कैसे बाहर निकाला?
A) हाथ पकड़कर
B) केशेषु आवाकृष्य (बालों से खींचकर)
C) पैर पकड़कर
D) झाड़ू से
उत्तर: B) केशेषु आवाकृष्य
प्रश्न 9: पाठ के अनुसार, बच्चों की गति कौन होती है?
A) पिता
B) गुरु
C) माता
D) राजा
उत्तर: C) माता
प्रश्न 10: अन्त में मन्त्री ने चारों अलसियों पर कैसा व्यवहार किया?
A) दंड दिया
B) निकाल दिया
C) ततोऽप्यधिकतरं वस्तु दापयामास (और अधिक सामग्री दिलवाई)
D) बन्दीगृह भेजा
उत्तर: C) ततोऽप्यधिकतरं वस्तु दापयामास
13. 5 Subjective प्रश्न
प्रश्न 1: विद्यापति के बारे में संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर: विद्यापति एक लोकप्रिय मैथिल कवि थे। उन्होंने ‘पुरुषपरीक्षा’ नामक कथाग्रन्थ की रचना की। संस्कृत साहित्य में उनका विशेष स्थान है और वे अनेक ग्रन्थों के रचयिता हैं।
प्रश्न 2: मन्त्री वीरेश्वर ने आलसियों को भोजन क्यों दिया?
उत्तर: वीरेश्वर स्वभाव से दानशील और दयालु थे। वह प्रतिदिन सभी दुर्गत एवं अनाथ लोगों को भोजन कराते थे। वह आलसियों को भी बिना किसी काम के भोजन देते थे क्योंकि वह किसी को भूखा नहीं रख सकते थे।
प्रश्न 3: चार अलसियों के संवाद का सारांश लिखिए।
उत्तर: चारों अलसी आग से घिरे होने पर भी उठे नहीं। एक ने शोर के बारे में पूछा, दूसरे ने बताया कि आग लगी है। तीसरे ने कोई धार्मिक वस्त्र ढकने की बात कही और चौथे ने सबको चुप रहने को कहा। यह उनकी अत्यधिक आलसिता को दर्शाता है।
प्रश्न 4: “पतिरेव गतिः स्त्रीणाम्” – इस श्लोक का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस श्लोक का अर्थ है कि स्त्रियों के लिए एकमात्र सहारा उनका पति होता है। बच्चों का सहारा उनकी माता होती है। लेकिन आलसियों का कोई सहारा नहीं होता जब तक कोई दयालु व्यक्ति उन पर दया न करे। यह आलस्य की निंदा करता है।
प्रश्न 5: इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आलस्य सबसे बड़ा दोष है। आलसी व्यक्ति स्वयं को तथा दूसरों को कष्ट देता है। व्यक्ति को परिश्रमी बनना चाहिए और समय रहते कार्य करना चाहिए, अन्यथा आलस्य उसका विनाश कर देता है।
