द्वादशः पाठः – कर्णस्य दानवीरता
विषय-सूची (Table of Content)
1. पाठ का परिचय एवं पृष्ठभूमि
2. ब्राह्मणरूपी इन्द्र का आगमन
3. कर्ण का इन्द्र को प्रणाम और आशीर्वाद
4. भिक्षा के लिए संवाद: गाय, घोड़े, हाथी, सोना
5. कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल का अद्वुत दान
6. शल्य का विरोध और कर्ण का उत्तर
7. संस्कृत व्याकरण विश्लेषण (संधि, समास, धातु-प्रत्यय)
8. शब्दार्थ (20 शब्दों के हिंदी अर्थ)
9. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) – 10 प्रश्न
10. लघुत्तरात्मक प्रश्न (Subjective) – 5 प्रश्न
1. पाठ परिचय एवं पृष्ठभूमि
द्वादशः पाठः – कर्णस्य दानवीरता। अयं पाठः भासरचितस्य कर्णभारनामकस्य रूपकस्य भागविशेषः। अस्य रूपकस्य कथानकं महाभारतात् गृहीतम्। महाभारतयुद्धे कुन्तीपुत्रः कर्णः कौरवपक्षतः युद्धं करोति। कर्णस्य शरीरेण सम्बद्धे कवचं कुण्डले च तस्य रक्षतः स्तः। यावत् कवचं कुण्डले च कर्णस्य शरीरे वर्तेते तावत् न कोऽपि कर्णं हन्तुं प्रभवति। अत एव अर्जुनस्य सहायतार्थम् इन्द्रः छलपूर्वकं कर्णस्य दानवीरस्य शरीरात् कवचं कुण्डले च गृह्णाति। कर्णः समोदम् अङ्गभूतं कवचं कुण्डले च ददाति।
हिंदी अनुवाद:
यह पाठ भास द्वारा रचित 'कर्णभार' नामक नाटक का एक अंश है। इस नाटक की कथा महाभारत से ली गई है। महाभारत युद्ध में कुंती के पुत्र कर्ण कौरवों की ओर से युद्ध करते हैं। कर्ण के शरीर से जुड़े कवच और कुंडल उसकी रक्षा करते हैं। जब तक कवच-कुंडल कर्ण के शरीर पर हैं, तब तक कोई भी कर्ण को मारने में समर्थ नहीं होता। इसलिए अर्जुन की सहायता के लिए इंद्र छलपूर्वक दानवीर कर्ण के शरीर से कवच और कुंडल ले लेते हैं। कर्ण प्रसन्नतापूर्वक अपने अंगों से जुड़े कवच-कुंडल दे देते हैं।
2. ब्राह्मणरूपी इन्द्र का आगमन
(ततः प्रविशति ब्राह्मणरूपेण शक्रः)
शक्रः – भो मेघाः, सूर्येणैव निवार्य गच्छन्तु भवन्तः। (कर्णमुपगम्य) भोः कर्ण! महत्तरां भिक्षां याचे।
हिंदी अनुवाद:
(तब ब्राह्मण के वेश में इंद्र प्रवेश करते हैं)
इंद्र – हे मेघो! सूर्य के द्वारा ही हटकर जाओ। (कर्ण के पास जाकर) हे कर्ण! मैं बहुत बड़ी भिक्षा माँगता हूँ।
3. कर्ण का इन्द्र को प्रणाम और आशीर्वाद
कर्णः – दृढं प्रीतोऽस्मि भगवन्! कर्णो भवन्तमहम् एष नमस्करोमि।
शक्रः – (आत्मगतम्) किं नु खलु मया वक्तव्यम्? ... भवतु दृष्टम्। (प्रकाशम्) भो कर्ण! सूर्य इव, चन्द्र इव, हिमवान् इव, सागर इव तिष्ठतु ते यशः।
हिंदी अनुवाद:
कर्ण – हे भगवन्! मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। कर्ण आपको प्रणाम करता हूँ।
इंद्र – (मन में) मुझे क्या कहना चाहिए? ... ठीक है, जो दिखता है वही कहता हूँ। (प्रकट में) हे कर्ण! सूर्य की तरह, चंद्रमा की तरह, हिमालय की तरह, समुद्र की तरह तुम्हारा यश स्थिर रहे।
4. भिक्षा के लिए संवाद: गाय, घोड़े, हाथी, सोना
कर्णः – सालङ्कारं गोसहस्रं ददामि।
शक्रः – नेच्छामि कर्ण!
कर्णः – बहुसहस्रं वाजिनां ते ददामि।
शक्रः – नेच्छामि।
कर्णः – वारणानामनेकं वृन्दमपि ते ददामि।
शक्रः – नेच्छामि।
कर्णः – अपर्याप्तं कनकं ददामि।
शक्रः – नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।
हिंदी अनुवाद:
कर्ण – आभूषणों सहित एक हज़ार गायें देता हूँ।
इंद्र – नहीं चाहिए, कर्ण!
कर्ण – हज़ारों घोड़े तुम्हें देता हूँ।
इंद्र – नहीं चाहिए।
कर्ण – हाथियों का अनेक समूह भी तुम्हें देता हूँ।
इंद्र – नहीं चाहिए।
कर्ण – असीमित सोना देता हूँ।
इंद्र – नहीं चाहिए, कर्ण! नहीं चाहिए।
5. कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल का अद्भुत दान
कर्णः – अङ्गैः सहैव जनितं मम देहरक्षा, देवासुरैरपि न भेद्यमिदं सहस्रैः। देयं तथापि कवचं सह कुण्डलाभ्यां, प्रीत्या मया भगवते रुचितं यदि स्यात्॥
शक्रः – (सहर्षम्) ददातु, ददातु।
कर्णः – गृह्यताम्।
हिंदी अनुवाद:
कर्ण – मेरे अंगों के साथ ही उत्पन्न यह कवच मेरी देह की रक्षा करता है, देवता और असुर भी सहस्रों प्रयत्नों से इसे नहीं भेद सकते। फिर भी यह कवच कुंडलों सहित देने योग्य है, यदि भगवान् प्रसन्नतापूर्वक इसे मुझसे ग्रहण करें।
इंद्र – (हर्ष से) दीजिए, दीजिए।
कर्ण – ग्रहण कीजिए।
6. शल्य का विरोध और कर्ण का उत्तर
शल्यः – अङ्गराज! न दातव्यं न दातव्यम्।
कर्णः – शल्यराज! अलम् अलं वारयितुम्। पश्य – शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात्, सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः। जलं जलस्थानगतं च शुष्यति, हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति। तस्मात् गृह्यताम्।
हिंदी अनुवाद:
शल्य – हे अंगराज! मत दीजिए, मत दीजिए।
कर्ण – हे शल्यराज! रोकने का प्रयास छोड़ें। देखिए – विद्या समय बीतने पर नष्ट हो जाती है, अच्छी जड़ों वाले वृक्ष भी गिर जाते हैं, जलाशय का जल भी सूख जाता है, किंतु यज्ञ में हवन किया हुआ और दान दिया हुआ – वही सदा स्थिर रहता है। इसलिए ग्रहण कीजिए।
7. संस्कृत व्याकरण
5 संधियाँ (Sandhi)
1. सूर्येणैव = सूर्येण + एव (वृद्धि संधि)
2. यत्नैः = यत्न + ऐः (वृद्धि संधि)
3. नृपश्रियः = नृप + श्रियः (गुण संधि)
4. देवासुरैः = देव + असुरैः (स्वर संधि – सवर्ण दीर्घ)
5. तथैव = तथा + एव (वृद्धि संधि)
5 समास (Samas)
1. महत्तराम् = महती + तर (कर्मधारय)
2. सालङ्कारम् = सह अलङ्कारेण (सह बहुव्रीहि)
3. दीर्घायुः = दीर्घम् आयुः (कर्मधारय)
4. देहरक्षा = देहस्य रक्षा (षष्ठी तत्पुरुष)
5. कपटबुद्धेः = कपटा बुद्धिः यस्य सः (बहुव्रीहि)
5 धातु + प्रकृति-प्रत्यय
1. गच्छन्तु – गम् धातु + लोट् (शप् + अन्ति)
2. नमस्करोमि – कृ धातु + लट् (शप् + मि)
3. ददामि – दा धातु + लट् (शप् + मि)
4. वारयितुम् – वृ धातु + तुम् (तुमुन् प्रत्यय)
5. तिष्ठति – स्था धातु + लट् (शप् + ति)
8. शब्दार्थ (20 Sanskrit to Hindi Meanings)
1. दानवीरता – दान में वीरता
2. भिक्षा – माँगना, भीख
3. प्रीतः – प्रसन्न
4. यशः – कीर्ति, प्रसिद्धि
5. दीर्घायुः – लंबी आयु वाला
6. शोभनम् – उत्तम, श्रेष्ठ
7. धर्मः – कर्तव्य, धर्म
8. यत्नैः – प्रयत्नों से
9. चपला – चंचल
10. प्रजापालनम् – प्रजा की रक्षा
11. गोसहस्रम् – एक हज़ार गायें
12. वाजिनाम् – घोड़ों के
13. वारणानाम् – हाथियों के
14. कनकम् – सोना
15. कवचम् – शरीर रक्षा का आवरण
16. कुण्डले – कानों के आभूषण
17. भेद्यम् – भेदने योग्य
18. शिक्षा – विद्या/कला
19. हुतम् – यज्ञ में डाला हुआ
20. गृह्यताम् – लिया जाए
9. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) – 10 प्रश्न
प्रश्न 1: कर्ण किस नाटक का पात्र है?
a) अभिज्ञानशाकुन्तलम्
b) कर्णभारम्
c) स्वप्नवासवदत्तम्
d) मुद्राराक्षसम्
उत्तर: b) कर्णभारम्
प्रश्न 2: कर्ण के शरीर से कौन ले जाता है कवच-कुण्डल?
a) शल्य
b) अर्जुन
c) इन्द्र
d) भीष्म
उत्तर: c) इन्द्र
प्रश्न 3: इन्द्र किस रूप में आते हैं?
a) क्षत्रिय
b) ब्राह्मण
c) वैश्य
d) शूद्र
उत्तर: b) ब्राह्मण
प्रश्न 4: कर्ण पहले क्या दान देना चाहता है?
a) हाथी
b) सोना
c) गाय
d) पृथ्वी
उत्तर: c) गाय
प्रश्न 5: "दीर्घायुर्भवेति" का अर्थ क्या है?
a) सुखी रहो
b) धनवान बनो
c) लंबी आयु वाले बनो
d) प्रसिद्ध बनो
उत्तर: c) लंबी आयु वाले बनो
प्रश्न 6: कर्ण को रोकने वाला राजा कौन है?
a) दुर्योधन
b) शल्य
c) शकुनि
d) अश्वत्थामा
उत्तर: b) शल्य
प्रश्न 7: कर्ण के अनुसार क्या सदा स्थिर रहता है?
a) धन
b) विद्या
c) हुत और दत्त (यज्ञदान)
d) शरीर
उत्तर: c) हुत और दत्त
प्रश्न 8: भास के कितने नाटक उपलब्ध हैं?
a) दस
b) ग्यारह
c) बारह
d) तेरह
उत्तर: d) तेरह
प्रश्न 9: "शिक्षा क्षयं गच्छति" का क्या अर्थ है?
a) शिक्षा बढ़ती है
b) विद्या नष्ट हो जाती है
c) शिक्षा स्थिर रहती है
d) विद्या ही बल है
उत्तर: b) विद्या नष्ट हो जाती है
प्रश्न 10: कर्ण का दूसरा नाम क्या है?
a) वासुदेव
b) सूर्यपुत्र
c) कौन्तेय (कुन्तीपुत्र)
d) भारद्वाज
उत्तर: c) कौन्तेय
10. लघुत्तरात्मक प्रश्न (Subjective) – 5 प्रश्न
प्रश्न 1: कर्ण दानवीर क्यों कहलाते हैं?
उत्तर: कर्ण दानवीर इसलिए कहलाते हैं क्योंकि वे अपने प्राणों से भी अधिक महत्वपूर्ण वस्तुएँ – कवच और कुण्डल – बिना किसी संकोच के दान कर देते हैं। वे छलपूर्वक माँगने पर भी दाता को प्रसन्नतापूर्वक वस्तु देते हैं। उनका मानना है कि दान दिया हुआ कभी नष्ट नहीं होता, जबकि संसार की समस्त वस्तुएँ नश्वर हैं।
प्रश्न 2: इन्द्र कर्ण को किस प्रकार के आशीर्वाद देते हैं और क्यों?
उत्तर: इन्द्र कर्ण को सूर्य, चन्द्रमा, हिमालय और समुद्र के समान अटूट यश का आशीर्वाद देते हैं। वे सीधा 'दीर्घायु हो' नहीं कहते, क्योंकि यदि कह देंगे तो वचन सत्य होने से कर्ण वास्तव में दीर्घायु हो जाएगा और उसे मारना असंभव होगा। अतः वे यश की स्थिरता का आशीर्वाद देकर अपने छल को छिपा लेते हैं।
प्रश्न 3: शल्य कर्ण को कवच-कुण्डल न देने का आग्रह क्यों करते हैं?
उत्तर: शल्य जानते हैं कि कवच-कुण्डल ही कर्ण की एकमात्र सुरक्षा है। यदि कर्ण उन्हें दे देगा तो युद्ध में वह अर्जुन के सामने असुरक्षित हो जाएगा और मारा जा सकता है। शल्य वास्तव में कर्ण के हितैषी हैं और उनकी रक्षा करना चाहते हैं। इसलिए वे 'न दातव्यम्, न दातव्यम्' (मत दो, मत दो) कहकर रोकते हैं।
प्रश्न 4: कर्ण के अनुसार 'हुतं च दत्तं च' नष्ट क्यों नहीं होता?
उत्तर: कर्ण कहते हैं कि शिक्षा समय से नष्ट हो सकती है, पेड़ गिर सकते हैं, जलाशय सूख सकते हैं, किन्तु यज्ञ में हवन की गई वस्तु (हुत) और दान में दी गई वस्तु (दत्त) कभी नष्ट नहीं होती। यह उनका दार्शनिक दृष्टिकोण है – भौतिक वस्तुएँ नश्वर हैं, जबकि दान और यज्ञ के पुण्य सनातन हैं और अगले जन्म में भी फल देते हैं।
प्रश्न 5: भास ने कर्णभार नाटक में किस मुख्य संदेश को उजागर किया है?
उत्तर: भास के 'कर्णभार' नाटक का मुख्य संदेश है – दान की महानता, आत्मोत्सर्ग और कर्तव्यपरायणता। कर्ण यह दिखाते हैं कि दाता का धर्म माँगने वाले को निराश नहीं करना है, चाहे वह कितनी ही कीमती वस्तु क्यों न माँगे। उनमें 'देयमिति दानवीरता' स्पष्ट दिखती है। साथ ही, भास मानवीय विडम्बना – कि दानी को उसी के दान से हानि हो – को भी रेखांकित करते हैं।
