मन्दाकिनीवर्णनम् – दशमः पाठः
विषय-सूची (Table of Contents)
1. अध्याय परिचय
2. श्लोक 1: विचित्र पुलिन वाली मन्दाकिनी
3. श्लोक 2: कुबेर की नलिनी के समान शोभा
4. श्लोक 3: मृगयूथों से पीये गए जल के घाट
5. श्लोक 4: तपस्वियों का स्नान
6. श्लोक 5: सूर्योपासना में लीन मुनि
7. श्लोक 6: नृत्य करता हुआ पर्वत
8. श्लोक 7: कहीं मणि जैसा जल, कहीं सिद्धजन
9. श्लोक 8: वायु से उड़ते पुष्प और तैरते पक्षी
10. श्लोक 9: चक्रवाकों की मधुर वाणी
11. श्लोक 10: चित्रकूट और मन्दाकिनी की श्रेष्ठता
12. व्याकरण खंड (Sandhi, Samas, Dhatu, अर्थ)
13. MCQ (वस्तुनिष्ठ प्रश्न) – 10
14. Subjective Questions (विस्तृत उत्तर) – 5
1. अध्याय परिचय
मन्दाकिनीवर्णनम् – दशमः पाठः। प्रस्तुतः पाठः वाल्मिकीयरामायणस्य अयोध्याकाण्डस्य पञ्चनवति (95) तमात् सर्गात् संकलितः। वनवासप्रसङ्गे रामः सीतया लक्ष्मणेन च सह चित्रकूटं प्राप्नोति। तत्रस्थिता मन्दाकिनीनदीं वर्णयन् सीतां सम्बोधयति। इयं नदी प्राकृतिकैरूपादानैः संविलता चित्तं हरति। अस्याः वर्णनं कालिदासः रघुवंशकाव्येऽपि (त्रयोदशसर्गे) करोति। अनुष्टुप्छन्दसि महर्षिः वाल्मिकीः मन्दाकिनीवर्णने प्रकृतेः यथार्थं चित्रणं करोति।
Hindi Anuvaad (अनुवाद):
मन्दाकिनी का वर्णन – दसवाँ पाठ। प्रस्तुत पाठ वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के पचानवेवें (95वें) सर्ग से संकलित किया गया है। वनवास के प्रसंग में राम, सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट पहुँचते हैं। वहाँ स्थित मन्दाकिनी नदी का वर्णन करते हुए राम सीता को सम्बोधित करते हैं। यह नदी प्राकृतिक उपादानों से युक्त होकर मन को हर लेती है। इसका वर्णन कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में भी (तेरहवें सर्ग में) किया है। अनुष्टुप् छन्द में महर्षि वाल्मीकि मन्दाकिनी के वर्णन में प्रकृति का यथार्थ चित्रण करते हैं।
2. श्लोक 1: विचित्र पुलिन वाली मन्दाकिनी
विचित्रपुलिनां रम्यां हंससारससेविताम्।
कुसुमैरूपसंपन्नां पश्य मन्दाकिनीं नदीम् ॥1॥
Hindi Anuvaad:
हे सीते! विचित्र बालू के तटों वाली, रमणीय, हंसों और सारस पक्षियों से सेवित तथा फूलों से परिपूर्ण इस मन्दाकिनी नदी को देखो।
3. श्लोक 2: कुबेर की नलिनी के समान शोभा
नानाविधैस्तीररूहैर्वृतां पुष्पफलद्रुमैः।
राजन्तीम् राजराजस्य नलिनीमिव सर्वतः ॥2॥
Hindi Anuvaad:
अनेक प्रकार के तट पर उगे हुए फूलों और फलों वाले वृक्षों से घिरी हुई, यह नदी सब ओर से धनपति कुबेर की नलिनी (कमलों वाली सरोवर) के समान शोभायमान है।
4. श्लोक 3: मृगयूथों से पीये गए जल के घाट
मृगयूथनिपीतानि कलुषाम्भांसि साम्प्रतम्।
तीर्थानि रमणीयानि रतिं संजनयन्ति मे ॥3॥
Hindi Anuvaad:
हिरणों के झुण्डों द्वारा पिये जाने से जिसका जल कुछ मटमैला हो गया है, ऐसे इस नदी के रमणीय तीर्थ (घाट) मेरे मन में आनन्द उत्पन्न करते हैं।
5. श्लोक 4: तपस्वियों का स्नान
जटाजिनधराः काले वल्कलोत्तरवाससः।
ऋषयस्त्ववगाहन्ते नदीं मन्दाकिनीं प्रिये ॥4॥
Hindi Anuvaad:
हे प्रिये (सीते)! जटाधारी, मृगचर्म धारण किए हुए और ऊपरी वस्त्र के रूप में वल्कल (वृक्ष की छाल) पहने हुए ऋषि उचित समय पर मन्दाकिनी नदी में स्नान करते हैं।
6. श्लोक 5: सूर्योपासना में लीन मुनि
आदित्यमुपतिष्ठन्ते नियमादूर्ध्वबाहवः।
एते परे विशालाक्षि मुनयः संशितव्रताः ॥5॥
Hindi Anuvaad:
हे विशाल नेत्रों वाली (सीते)! ये दूसरी ओर स्थित दृढ़ व्रत वाले मुनि नियमपूर्वक दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्य की उपासना कर रहे हैं।
7. श्लोक 6: नृत्य करता हुआ पर्वत
मारुतोद्धूतशिखरैः प्रनृत इव पर्वतः।
पादपैः पुष्पपत्राणि सृजद्भिरभितो नदीम् ॥6॥
Hindi Anuvaad:
वायु से हिलते हुए शिखरों वाला यह पर्वत मानो नृत्य कर रहा हो, और उसके वृक्ष चारों ओर नदी में फूल और पत्ते गिरा रहे हैं।
8. श्लोक 7: कहीं मणि जैसा जल, कहीं सिद्धजन
क्वचिन्मणिनिकाशोदां क्वचित्पुलिनशालिनीम्।
क्वचित्सिद्धजनाकीर्णां पश्य मन्दाकिनीं नदीम् ॥7॥
Hindi Anuvaad:
कहीं मणि के समान निर्मल जल वाली, कहीं सुन्दर बालू के तटों से युक्त और कहीं सिद्ध पुरुषों से भरी हुई इस मन्दाकिनी नदी को देखो।
9. श्लोक 8: वायु से उड़ते पुष्प और तैरते पक्षी
निर्धूतान् वायुना पश्य विततान् पुष्पसञ्चयान्।
पोप्लूयमानानपरान् पश्य त्वं जलमध्यगान् ॥8॥
Hindi Anuvaad:
वायु द्वारा उड़ाए गए और इधर-उधर बिखरे हुए फूलों के समूहों को देखो। और जल के बीच में तैरते हुए दूसरे पक्षियों को भी देखो।
10. श्लोक 9: चक्रवाकों की मधुर वाणी
तांश्चातिवल्गुवचसो रथाङ्गाहवयना द्विजाः।
अधिरोहन्ति कल्याणि निष्कूजन्तः शुभा गिरः ॥9॥
Hindi Anuvaad:
हे कल्याणि (सीते)! अत्यन्त मधुर वाणी बोलने वाले और ‘रथांग’ (चक्रवाक) नाम से पुकारे जाने वाले वे द्विज (पक्षी) शुभ ध्वनि करते हुए वृक्षों पर चढ़ रहे हैं।
11. श्लोक 10: चित्रकूट और मन्दाकिनी की श्रेष्ठता
दर्शनं चित्रकूटस्य मन्दाकिन्याश्च शोभने।
अधिकं पुरवासाच्च मन्ये तव च दर्शनात् ॥10॥
Hindi Anuvaad:
हे शोभने (सुन्दरी सीते)! चित्रकूट पर्वत और मन्दाकिनी नदी के दर्शन को मैं नगर में रहने से भी अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ – और तुम्हारे दर्शन से भी (अर्थात् यह दृश्य तुमसे भी बढ़कर मनोहर है – श्लेष)।
12. व्याकरण खंड (Grammar Section)
A. 5 संधि उदाहरण (Sanskrit)
| 1 | सः + एव = स एव | विसर्ग संधि (लोप) | (अन्य प्रयोग) या ‘तथा एव’ (तथैव – न हो तो) |
| 2 | महर्षिः + वाल्मिकीः = महर्षिर्वाल्मिकीः | विसर्ग संधि (रुत्व/र्त्व) | पाठ में ‘वाल्मिकीः’ से पहले |
| 3 | उप + संपन्नाम् = उपसंपन्नाम् | स्वर संधि (उ + अ = उप) | कुसुमैरुपसंपन्नाम् (श्लोक 1) |
| 4 | नदीम् + इव = नदीमिव | स्वर संधि (ई + इ = ई + अ/इ) | नलिनीमिव (श्लोक 2) |
| 5 | अभितः + नदीम् = अभितो नदीम् | विसर्ग संधि (ओ) | अभितो नदीम् (श्लोक 6) |
B. 5 समास उदाहरण (Sanskrit)
| 1 | विचित्रपुलिनाम् | विचित्रं पुलिनं यस्याः | बहुव्रीहि |
| 2 | हंससारससेविताम् | हंसैः सारसैश्च सेविताम् | द्वन्द्व + कर्मधारय |
| 3 | पुष्पफलद्रुमैः | पुष्पाणि च फलानि च ते द्रुमाः (तेः) | द्वन्द्व |
| 4 | जटाजिनधराः | जटाः च अजिनं च धरन्ति ये | बहुव्रीहि |
| 5 | ऊर्ध्वबाहवः | ऊर्ध्वौ बाहू येषाम् | बहुव्रीहि |
C. 5 धातु + प्रकृति + प्रत्यय (Sanskrit)
| 1 | दृश् (पश्य) | देखना | पश्य | लोट् (मध्यम पुरुष) | पश्य |
| 2 | सेव् | सेवा करना | सेविताम् | क्त | सेविताम् |
| 3 | नी | ले जाना | प्राप्नोति | तिप् (लट्) | प्राप्नोति |
| 4 | गाह् | स्नान करना | अवगाहन्ते | झ (लट्, आत्मनेपद) | अवगाहन्ते |
| 5 | जन् | उत्पन्न होना | संजनयन्ति | णिच् + अन्ति | संजनयन्ति |
D. 20 शब्दार्थ (Sanskrit to Hindi)
| 1 | विचित्र = अद्भुत, विभिन्न |
| 2 | पुलिन = बालू का तट |
| 3 | रम्या = सुन्दर, मनोहर |
| 4 | सेविता = सेवा की हुई, युक्त |
| 5 | कुसुम = फूल |
| 6 | उपसंपन्ना = परिपूर्ण, युक्त |
| 7 | नानाविधैः = अनेक प्रकार के |
| 8 | तीररूहैः = तट पर उगे हुए |
| 9 | राजन्तीम् = शोभायमान |
| 10 | नलिनी = कमलों वाली झील |
| 11 | मृगयूथ = हिरणों का समूह |
| 12 | निपीतानि = पिये हुए |
| 13 | कलुष = मटमैला, गन्दा |
| 14 | रति = आनन्द |
| 15 | जटा = जूड़ा (बालों का) |
| 16 | अजिन = मृगचर्म |
| 17 | वल्कल = वृक्ष की छाल |
| 18 | अवगाहन्ते = स्नान करते हैं |
| 19 | नियमात् = नियमपूर्वक |
| 20 | शोभने = सुन्दरी |
13. MCQ (वस्तुनिष्ठ प्रश्न) – 10 प्रश्न
1. मन्दाकिनी नदी किसके द्वारा सेवित है?
a) मोर और तोते
b) हंस और सारस
c) कोयल और बगुले
d) गिद्ध और कौवे
उत्तर: b) हंस और सारस
2. राम के अनुसार, मन्दाकिनी का जल कैसा है?
a) बिल्कुल साफ
b) मटमैला (हिरणों के पीने से)
c) नीला
d) खारा
उत्तर: b) मटमैला (हिरणों के पीने से)
3. ऋषि किस प्रकार के वस्त्र पहनते हैं?
a) रेशमी वस्त्र
b) सूती वस्त्र
c) वल्कल (छाल)
d) ऊनी वस्त्र
उत्तर: c) वल्कल (छाल)
4. मुनि सूर्य की उपासना कैसे करते हैं?
a) सिर झुकाकर
b) ऊर्ध्वबाहु (हाथ ऊपर करके)
c) बैठकर
d) लेटकर
उत्तर: b) ऊर्ध्वबाहु (हाथ ऊपर करके)
5. पर्वत किसके समान नृत्य कर रहा है?
a) मयूर के समान
b) इन्द्र के समान
c) गन्धर्व के समान
d) मानव के समान
उत्तर: a) मयूर के समान (प्रनृत इव पर्वतः – नृत्य करता हुआ सा)
6. ‘क्वचित् सिद्धजनाकीर्णाम्’ का क्या अर्थ है?
a) जहाँ सिद्धजन न हों
b) जहाँ सिद्धजन भरे हों
c) जहाँ राक्षस हों
d) जहाँ जल न हो
उत्तर: b) जहाँ सिद्धजन भरे हों
7. राम किसके दर्शन को सबसे अधिक श्रेष्ठ मानते हैं?
a) केवल सीता के
b) चित्रकूट और मन्दाकिनी के (सीता से भी बढ़कर)
c) अयोध्या के
d) लक्ष्मण के
उत्तर: b) चित्रकूट और मन्दाकिनी के
8. ‘रथाङ्ग’ किस पक्षी का नाम है?
a) हंस
b) चकवा/चक्रवाक
c) सारस
d) कोकिल
उत्तर: b) चकवा/चक्रवाक
9. वाल्मीकि ने इस पाठ में किस छन्द का प्रयोग किया है?
a) वसंततिलका
b) शिखरिणी
c) अनुष्टुप्
d) मन्दाक्रान्ता
उत्तर: c) अनुष्टुप्
10. ‘राजराजस्य’ किसको कहा गया है?
a) राम को
b) इन्द्र को
c) कुबेर को
d) यम को
उत्तर: c) कुबेर को
14. Subjective Questions (व्याख्यात्मक प्रश्न)
प्रश्न 1: राम मन्दाकिनी नदी के किन-किन गुणों का वर्णन करते हैं?
उत्तर: राम मन्दाकिनी के तीन प्रमुख गुण बताते हैं। पहला, इसके बालू के तट विचित्र हैं और यह हंस-सारसों से युक्त है तथा फूलों से परिपूर्ण है। दूसरा, नदी के जल में हिरणों के पीने से मटमैलापन आ गया है, फिर भी इसके घाट रमणीय हैं। तीसरा, यहाँ कहीं जल मणि के समान निर्मल है, कहीं बालू के तट सुन्दर हैं और कहीं सिद्धजन इससे भरे हैं।
प्रश्न 2: चित्रकूट पर्वत को नृत्य करता हुआ क्यों कहा गया है?
उत्तर: चित्रकूट पर्वत को नृत्य करता हुआ इसलिए कहा गया है क्योंकि तेज वायु (मारुत) के झोंकों से उसके शिखर (चोटियाँ) हिल रही थीं। यह हिलना एक प्रकार के नृत्य जैसा प्रतीत हो रहा था। साथ ही, पर्वत पर स्थित वृक्ष नदी में अपने फूल और पत्ते गिरा रहे थे, मानो वे नृत्य के साथ अभिनय कर रहे हों।
प्रश्न 3: ‘अधिकं पुरवासाच्च मन्ये तव च दर्शनात्’ – इस पंक्ति में राम क्या श्लेष (व्यंग्य या दोहरा अर्थ) प्रस्तुत कर रहे हैं?
उत्तर: इस पंक्ति में राम कहते हैं कि चित्रकूट और मन्दाकिनी का दर्शन नगरवास से भी अधिक है। वे आगे कहते हैं – ‘तव च दर्शनात्’ जिसके दो अर्थ हो सकते हैं। पहला अर्थः यह दृश्य तुम्हारे (सीता के) दर्शन से भी अधिक सुन्दर है। दूसरा अर्थ (प्रिय सीता से कहते हुए)ः हे सीता, मैं तुम्हारे दर्शन को भी इससे कम नहीं मानता, पर यह प्राकृतिक सौंदर्य अद्वितीय है। यहाँ राम विनम्रता से प्रकृति की महिमा का गान कर रहे हैं।
प्रश्न 4: ऋषि-मुनि किस प्रकार के जीवन का पालन करते हैं, इस पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर: इस पाठ के अनुसार ऋषि-मुनि सादा और कठोर जीवन जीते हैं। वे जटा धारण करते हैं, मृगचर्म पहनते हैं तथा वल्कल (वस्त्र) ओढ़ते हैं। वे नियम से मन्दाकिनी में स्नान करते हैं और अपनी भुजाएँ ऊपर करके (ऊर्ध्वबाहु) सूर्य की उपासना करते हैं। इनके व्रत दृढ़ (संशित) होते हैं, अर्थात ये घोर तपस्या में लीन रहते हैं।
प्रश्न 5: कालिदास ने भी मन्दाकिनी का वर्णन किया, ऐसा पाठ के आरंभ में क्यों कहा गया है? इसका क्या महत्व है?
**उत्तर:** पाठ के आरंभ में यह बताने का उद्देश्य है कि मन्दाकिनी केवल रामायण में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य की एक महत्वपूर्ण नदी है। महाकवि कालिदास ने अपने ‘रघुवंश’ महाकाव्य के त्रयोदश सर्ग में इसी नदी का अलंकृत वर्णन किया है। यह बताना इसलिए महत्वपूर्ण है कि जहाँ वाल्मीकि ने इसे यथार्थ और सरल रूप में चित्रित किया, वहीं कालिदास ने कलात्मक सौन्दर्य से परिपूर्ण किया। इससे पता चलता है कि मन्दाकिनी साहित्यिक दृष्टि से एक अमर विषय रही है।
