स्वामी दयानन्दः – समाज एवं शिक्षा के सुधारक (नवमः पाठः)
विषय-सूची (Table of Content)
1. परिचय: आधुनिक भारत के महान उद्धारक
2. मध्यकालीन भारतीय समाज की बुराइयाँ
3. स्वामी दयानन्द का बाल्यकाल एवं आध्यात्मिक जागरण
4. गुरु विरजानन्द से शिक्षा एवं वैदिक धर्म का प्रचार
5. सामाजिक सुधारों में योगदान और सत्यार्थप्रकाश
6. आर्यसमाज की स्थापना और वर्तमान प्रासंगिकता
1. परिचय: आधुनिक भारत के महान उद्धारक
आधुनिकभारते समाजस्य शिक्षायाश्च महान् उद्धारकः स्वामी दयानन्दः। आर्यसमाजनामकसंस्थायाः संस्थापनेन एतस्य प्रभूतं योगदानं भारतीयसमाजे गृह्यते। भारतवर्षे राष्ट्रीयतायाः बोधोऽपि अस्य कार्यविशेषः। समाजे अनेकाः दूषिताः प्रथाः खण्डयित्वा शुद्धतत्त्वज्ञानस्य प्रचारं दयानन्दः अकरोत्। अयं पाठः स्वामिनो दयानन्दस्य परिचयं तस्य समाजोद्धरणे योगदानं च निरूपयति।
हिंदी अनुवाद:
(आधुनिक भारत में समाज और शिक्षा के महान उद्धारक स्वामी दयानन्द हैं। आर्यसमाज नामक संस्था की स्थापना द्वारा इनका भारतीय समाज में प्रभूत योगदान स्वीकार किया जाता है। भारतवर्ष में राष्ट्रीयता की जागृति भी इनके कार्यों की विशेषता है। समाज में अनेक दूषित प्रथाओं को खण्डित करके दयानन्द ने शुद्ध तत्त्वज्ञान का प्रचार किया। यह पाठ स्वामी दयानन्द का परिचय और समाजोद्धार में उनके योगदान को प्रस्तुत करता है।)
2. मध्यकालीन भारतीय समाज की बुराइयाँ
मध्यकाले नाना कुत्सितरीतयः भारतीयं समाजम् अदूषयन्। जातिवादकृतं वैषम्यम्, अस्पृश्यता, धर्मकार्येषु आडम्बरः, स्त्रीणाम् अशिक्षा, विद्वतां गर्हिता स्थितिः, शिक्षायाः अव्यापकता इत्यादयः दोषाः प्राचीनसमाजे आसन्। अतः अनेके दलिताः हिन्दुसमाजं तिरस्कृत्य धर्मान्तरं स्वीकृतवन्तः। तादृशे विषमे तस्मिन् काले ऊनविंशशतके केचन धर्मोद्धारकाः सत्यान्वेषिणः समाजस्य वैषम्यनिवारकाः भारतवर्षे प्रादुरभवन्। तेषु नूनं स्वामी दयानन्दः विचारणायाः व्यापकत्वात् समाजोद्धरणस्य संकल्पाच्च शिखरस्थानीयः।
हिंदी अनुवाद:
(मध्यकाल में अनेक बुरी रीतियों ने भारतीय समाज को दूषित किया। जातिवाद से उत्पन्न वैषम्य, अस्पृश्यता, धार्मिक कार्यों में आडम्बर, स्त्रियों की अशिक्षा, विद्वानों की दयनीय स्थिति तथा शिक्षा की अव्यापकता आदि दोष प्राचीन समाज में थे। इसलिए अनेक दलितों ने हिन्दू समाज को तिरस्कृत कर धर्मान्तरण स्वीकार कर लिया। ऐसी विषम स्थिति में उस काल में उन्नीसवीं शताब्दी में कुछ धर्मोद्धारक, सत्यान्वेषी और समाज के वैषम्य को दूर करने वाले भारतवर्ष में प्रकट हुए। उनमें निश्चय ही स्वामी दयानन्द अपने विचारों की व्यापकता और समाजोद्धार के संकल्प के कारण शिखर पर हैं।)
3. स्वामी दयानन्द का बाल्यकाल एवं आध्यात्मिक जागरण
स्वामिनः जन्म गुजरातप्रदेशस्य टेकारानामके ग्रामे 1824 ईस्वीवर्षे अभूत्। बालकस्य नाम मूलशङ्करः इति कृतम्। संस्कृतशिक्षया एव अध्ययनस्य अस्य प्रारम्भः जातः। कर्मकाण्डपरिवारे मूलशङ्करस्य कृते शिवरात्रिमहापर्व उद्बोधकम् अभवत्। रात्रिजागरणकाले मूलशङ्करेण दृष्टं यत् शङ्करस्य विग्रहम् आरूढ्वा मूषकाः विग्रहार्पितानि द्रव्याणि भक्षयन्ति। मूलशङ्करः अचिन्तयत् यत् विग्रहः अयम् ईश्वरः। वस्तुतः देवः प्रतिमायां नास्ति। रात्रिजागरणं विहाय मूलशङ्करः गृहं गतः। ततः एव मूलशङ्करस्य मूर्तिपूजां प्रति अनास्था जाता।
हिंदी अनुवाद:
(स्वामीजी का जन्म गुजरात प्रदेश के टेकारा नामक ग्राम में सन् 1824 ईस्वी में हुआ। बालक का नाम मूलशङ्कर रखा गया। संस्कृत शिक्षा से ही इसके अध्ययन का प्रारम्भ हुआ। कर्मकाण्डी परिवार में मूलशङ्कर के लिए शिवरात्रि का महापर्व उद्बोधक बना। रात्रि जागरण के समय मूलशङ्कर ने देखा कि शिव की मूर्ति पर चढ़कर चूहे मूर्ति पर चढ़ाई गई वस्तुओं को खा रहे हैं। मूलशङ्कर ने सोचा कि क्या यह मूर्ति ईश्वर है? वास्तव में देवता प्रतिमा में नहीं है। रात्रि जागरण छोड़कर मूलशङ्कर घर चले गए। तभी से मूलशङ्कर की मूर्तिपूजा के प्रति अनास्था हो गई।)
4. गुरु विरजानन्द से शिक्षा एवं वैदिक धर्म का प्रचार
वर्षद्वयाभ्यन्तरे एव तस्य परिजनानां निधनम् अभवत्। ततः मूलशङ्करे वैराग्यभावः समागतः। गृहं परित्यज्य विभिन्नानां विदुषां सतां साधूनाञ्च सत्सङ्गे रममाणः सः मथुरायाम् विरजानन्दस्य प्रज्ञाचक्षुषः विदुषः समीपम् अगमत्। तस्मात् आर्षग्रन्थानाम् अध्ययनम् आरभत। विरजानन्दस्य उपदेशात् वैदिकधर्मस्य प्रचारे सत्यस्य प्रसारे च स्वजीवनम् असमर्पयत्। यत्र तत्र धर्माडम्बराणां खण्डनम् अपि सः अकरोत्। अनेके पण्डिताः तेन पराजिताः तस्य मते दीक्षिताः।
हिंदी अनुवाद:
(दो वर्ष के भीतर ही उसके परिजनों का निधन हो गया। तब मूलशङ्कर में वैराग्य भाव आ गया। घर छोड़कर विभिन्न विद्वानों, सज्जनों और साधुओं के सत्संग में रमते हुए वे मथुरा में ज्ञानचक्षु विद्वान विरजानन्द के पास पहुँचे। उनसे आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन प्रारम्भ किया। विरजानन्द के उपदेश से वैदिक धर्म के प्रचार और सत्य के प्रसार में अपना जीवन समर्पित कर दिया। जहाँ-तहाँ धार्मिक आडम्बरों का खण्डन भी किया। अनेक पण्डित उनसे पराजित हुए और उनके मत में दीक्षित हुए।)
5. सामाजिक सुधारों में योगदान और सत्यार्थप्रकाश
स्त्रीशिक्षायाः, विधवाविवाहस्य, मूर्तिपूजाखण्डनस्य, अस्पृश्यतायाः, बालविवाहस्य च निवारणाय तेन महान् प्रयासः विभिन्नैः समाजोद्धारकैः सह कृतः। स्वसिद्धान्तानां सङ्कलनाय “सत्यार्थप्रकाशः” इति नामकं ग्रन्थं राष्ट्रभाषायाम् (हिन्दीभाषायाम्) विरच्य स्वानुयायिनां वेदान्तम् उपकृतवान्। किञ्च, वेदान् प्रति सर्वेषां धर्मानुयायिनां ध्यानम् आकर्षयन् स्वयम् वेदभाष्याणि संस्कृतहिन्दीभाषाभ्याम् अरचयत्। प्राचीनशिक्षायां दोषान् दर्शयित्वा नवीनां शिक्षापद्धतिम् असौ अदर्शयत्।
हिंदी अनुवाद:
(स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, मूर्तिपूजा-खण्डन, अस्पृश्यता तथा बाल-विवाह की रोकथाम के लिए उन्होंने विभिन्न समाजसुधारकों के साथ मिलकर महान प्रयास किये। अपने सिद्धान्तों के संकलन के लिए “सत्यार्थप्रकाश” नामक ग्रन्थ राष्ट्रभाषा (हिन्दी भाषा) में लिखकर अपने अनुयायियों का वेदान्त के प्रति उपकार किया। इसके अतिरिक्त, वेदों की ओर सभी धर्मानुयायियों का ध्यान आकर्षित करते हुए स्वयं संस्कृत और हिन्दी भाषाओं में वेदभाष्य रचे। प्राचीन शिक्षा के दोष दिखाकर नवीन शिक्षा पद्धति का प्रदर्शन किया।)
6. आर्यसमाज की स्थापना और वर्तमान प्रासंगिकता
स्वसिद्धान्तानां कार्यान्वयनाय 1875 ईस्वीवर्षे मुम्बईनगरे आर्यसमाजसंस्थायाः स्थापनां कृत्वा अनुयायिनां कृते मूर्तरूपेण समाजसंशोधनोद्देश्यं प्राकटयत्। सम्प्रति आर्यसमाजस्य शाखाः प्रशाखाः च देशे विदेशेषु च प्रायः प्रतिनगरं वर्तन्ते। सर्वत्र समाजदूषणानि शिक्षामलानि च शोध्यन्ते। शिक्षापद्धतौ गुरुकुलानां डी०ए०वी० (दयानन्द एङ्ग्लो वैदिक) विद्यालयानां च समूहः स्वामिनो दयानन्दस्य मृत्योः (1883 ईस्वीवर्षे) अनन्तरं तदनुयायिभिः आरब्धः। वर्तमानशिक्षापद्धतौ समाजस्य प्रवर्तने च दयानन्दस्य आर्यसमाजस्य च योगदानं सदा स्मरणीयम् इति।
हिंदी अनुवाद:
(अपने सिद्धान्तों को कार्यरूप देने के लिए सन् 1875 ईस्वी में मुम्बई नगर में आर्यसमाज संस्था की स्थापना करके अनुयायियों के लिए समाज-संशोधन के उद्देश्य को मूर्त रूप में प्रकट किया। आजकल आर्यसमाज की शाखाएँ और प्रशाखाएँ देश-विदेश में प्रायः प्रत्येक नगर में हैं। सर्वत्र समाज की बुराइयों और शिक्षा के दोषों को दूर किया जाता है। शिक्षा पद्धति में गुरुकुलों और डी.ए.वी. (दयानन्द एंग्लो वैदिक) विद्यालयों का समूह स्वामी दयानन्द की मृत्यु (सन् 1883 ईस्वी) के अनन्तर उनके अनुयायियों द्वारा आरम्भ किया गया। वर्तमान शिक्षा पद्धति में और समाज के संचालन में दयानन्द और आर्यसमाज का योगदान सदा स्मरणीय है।)
व्याकरण एवं अभ्यास भाग
(क) 5 संधि-विच्छेद (संस्कृत)
1. निरूपयति = नि + रूपयति
2. अदूषयन् = अ + दूषयन्
3. प्रादुरभवन् = प्र + आदुरभवन् (या प्र + आदुः + अभवन्)
4. शिखरस्थानीयः = शिखर + स्थानीयः
5. समागतः = सम् + आगतः
(ख) 5 समास (संस्कृत)
1. कर्मकाण्डपरिवारे = कर्मकाण्डस्य परिवारः (षष्ठी तत्पुरुष)
2. रात्रिजागरणकाले = रात्रौ जागरणम् (सप्तमी तत्पुरुष)
3. विग्रहार्पितानि = विग्रहाय अर्पितानि (चतुर्थी तत्पुरुष)
4. धर्माडम्बराणाम् = धर्मस्य आडम्बरः (षष्ठी तत्पुरुष)
5. समाजोद्धारकैः = समाजस्य उद्धारकः (षष्ठी तत्पुरुष)
1. अकरोत् = कृ (धातु) + लङ् (प्रत्यय)
2. गृह्यते = ग्रह् (धातु) + लट् (प्रत्यय)
3. अचिन्तयत् = चिन्त् (धातु) + लङ् (प्रत्यय)
4. असमर्पयत् = सम् + रुध्/सृज्? (यहाँ समर्पयत् – सम् + ऋ + णिच् + लङ्) – मूल धातु: ऋ (गति में)
5. अरचयत् = रच् (धातु) + णिच् + लङ् (प्रत्यय)
1. उद्धारकः = उद्धार करने वाला
2. प्रभूतम् = बहुत अधिक
3. खण्डयित्वा = तोड़कर, खण्डन करके
4. कुत्सितरीतयः = बुरी प्रथाएँ
5. वैषम्यम् = असमानता, भेदभाव
6. अस्पृश्यता = छुआछूत
7. आडम्बरः = दिखावा
8. अव्यापकता = कम व्याप्ति, फैलाव का अभाव
9. धर्मान्तरम् = दूसरा धर्म
10. सत्यान्वेषिणः = सत्य की खोज करने वाले
11. विग्रहम् = मूर्ति
12. मूषकाः = चूहे
13. अनास्था = आस्था न होना, उपेक्षा
14. वैराग्यभावः = वैराग्य का भाव, त्याग की प्रवृत्ति
15. सत्सङ्गे = अच्छे लोगों की संगति में
16. प्रज्ञाचक्षुषः = ज्ञानरूपी नेत्रों वाले (अंधे लेकिन ज्ञानी)
17. आर्षग्रन्थानाम् = ऋषियों के ग्रन्थों का
18. असमर्पयत् = समर्पित कर दिया
19. खण्डनम् = निराकरण, गलत सिद्ध करना
20. स्मरणीयम् = याद करने योग्य
(ङ) 10 MCQ (बहुविकल्पीय प्रश्न)
प्रश्न 1: स्वामी दयानन्द का जन्म कहाँ हुआ था?
a) काशी
b) टेकारा, गुजरात
c) मथुरा
d) दिल्ली
उत्तर: b) टेकारा, गुजरात
प्रश्न 2: स्वामी दयानन्द का बचपन का नाम क्या था?
a) दयानन्द
b) विरजानन्द
c) मूलशङ्कर
d) शिवशङ्कर
उत्तर: c) मूलशङ्कर
प्रश्न 3: शिवरात्रि की रात मूलशङ्कर ने क्या देखा?
a) भगवान शिव का प्रकट होना
b) चूहों का मूर्ति पर चढ़कर भोजन खाना
c) मूर्ति का चमकना
d) साधुओं का आना
उत्तर: b) चूहों का मूर्ति पर चढ़कर भोजन खाना
प्रश्न 4: मूलशङ्कर को सच्चा ज्ञान किस विद्वान से मिला?
a) दयानन्द
b) विरजानन्द
c) विवेकानन्द
d) रामानन्द
उत्तर: b) विरजानन्द
प्रश्न 5: स्वामी दयानन्द ने अपना जीवन किसके प्रचार-प्रसार में लगा दिया?
a) वैष्णव धर्म
b) वैदिक धर्म
c) जैन धर्म
d) बौद्ध धर्म
उत्तर: b) वैदिक धर्म
प्रश्न 6: स्वामी दयानन्द द्वारा लिखा गया प्रसिद्ध ग्रन्थ कौन-सा है?
a) गीता रहस्य
b) सत्यार्थप्रकाश
c) वेदांत दर्शन
d) आर्य भाष्य
उत्तर: b) सत्यार्थप्रकाश
प्रश्न 7: आर्यसमाज की स्थापना कब हुई थी?
a) 1824 ई.
b) 1857 ई.
c) 1875 ई.
d) 1883 ई.
उत्तर: c) 1875 ई.
प्रश्न 8: स्वामी दयानन्द के अनुसार वास्तव में देवता कहाँ नहीं है?
a) वेदों में
b) प्रतिमाओं (मूर्तियों) में
c) आत्मा में
d) प्रकृति में
उत्तर: b) प्रतिमाओं (मूर्तियों) में
प्रश्न 9: D.A.V. विद्यालयों का समूह किससे प्रेरित है?
a) स्वामी विवेकानन्द
b) महात्मा गाँधी
c) स्वामी दयानन्द
d) राजा राममोहन राय
उत्तर: c) स्वामी दयानन्द
प्रश्न 10: मध्यकाल में दलितों ने हिन्दू समाज को तिरस्कृत कर क्या स्वीकार कर लिया था?
a) शिक्षा
b) धर्मान्तरण
c) संन्यास
d) व्यापार
उत्तर: b) धर्मान्तरण
(च) 5 Subjective Questions (गद्यात्मक प्रश्न)
प्रश्न 1: स्वामी दयानन्द ने अपना गृह क्यों छोड़ दिया और वे किसकी खोज में निकले?
उत्तर: स्वामी दयानन्द ने अपना गृह इसलिए छोड़ दिया क्योंकि दो वर्षों के भीतर ही उनके सभी परिजनों का निधन हो गया था, जिससे उनमें वैराग्य भाव आ गया। वे जीवन के सत्य और मोक्ष के मार्ग को खोजने के लिए घर छोड़कर निकले। उन्होंने विभिन्न विद्वानों, साधुओं और सज्जनों के सत्संग में रहकर सत्य की खोज की और अंततः मथुरा में विरजानन्द जैसे प्रज्ञाचक्षु विद्वान से आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन किया।
प्रश्न 2: मूर्तिपूजा के बारे में शिवरात्रि की घटना के बाद मूलशङ्कर के मन में क्या विचार आया और उसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: शिवरात्रि की रात मूलशङ्कर ने देखा कि शिव की मूर्ति पर चूहे चढ़कर मूर्ति पर रखे भोजन को खा रहे हैं। इससे उनके मन में यह विचार आया कि यदि यह मूर्ति ही ईश्वर होती तो वह चूहों को अपने अंगों पर चढ़ने और भोजन खाने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि वास्तव में ईश्वर प्रतिमा में नहीं है। इस घटना के बाद मूलशङ्कर की मूर्तिपूजा के प्रति अनास्था (आस्था न रहना) हो गई और उन्होंने रात्रि जागरण छोड़कर घर जाने का निर्णय लिया।
प्रश्न 3: स्वामी दयानन्द ने भारतीय समाज में व्याप्त किन-किन बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और उनके द्वारा कौन-से दो प्रमुख कार्य किए गए?
उत्तर: स्वामी दयानन्द ने स्त्री-शिक्षा की कमी, विधवा-विवाह का न होना, मूर्तिपूजा, अस्पृश्यता और बाल-विवाह जैसी प्रचलित बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। उनके द्वारा किए गए दो प्रमुख कार्य हैं – पहला, उन्होंने अपने सिद्धान्तों को संकलित करते हुए हिंदी भाषा में “सत्यार्थप्रकाश” नामक ग्रन्थ लिखा। दूसरा, उन्होंने वेदों के भाष्य संस्कृत और हिन्दी में लिखकर आम लोगों को वैदिक ज्ञान से जोड़ने का कार्य किया।
प्रश्न 4: स्वामी दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना क्यों की और इस संस्था का वर्तमान में क्या योगदान है?
उत्तर: स्वामी दयानन्द ने अपने सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप देने और समाज सुधार के उद्देश्यों को मूर्त रूप प्रदान करने के लिए सन् 1875 में मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। वर्तमान में आर्यसमाज की शाखाएँ देश-विदेश के लगभग हर नगर में हैं। यह संस्था सामाजिक बुराइयों को दूर करने और शिक्षा के दोषों को सुधारने का कार्य करती है। आर्यसमाज ने गुरुकुलों और डी.ए.वी. विद्यालयों की शिक्षा पद्धति विकसित करके देश की शिक्षा और समाज सेवा में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
प्रश्न 5: पाठ के आधार पर बताइए कि स्वामी दयानन्द को ‘समाज और शिक्षा का महान उद्धारक’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: स्वामी दयानन्द को ‘समाज और शिक्षा का महान उद्धारक’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने मध्यकाल में समाज में व्याप्त जातिवाद, अस्पृश्यता, आडम्बर और स्त्री-अशिक्षा जैसी बुराइयों का डटकर विरोध किया। उन्होंने प्राचीन शिक्षा प्रणाली में व्याप्त दोषों को दूर करके नवीन शिक्षा पद्धति का प्रतिपादन किया तथा वेदों के ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाया। आर्यसमाज और डी.ए.वी. विद्यालयों जैसी संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने समाज सुधार और शिक्षा प्रसार का जो कार्य किया, वह आज भी प्रासंगिक और स्मरणीय है।
